एक
सूरज
वही मस्तमौला सा सूरज
फिर उगा है
पर
आज वो आसमान में नहीं
मेरे भीतर खिला है।
दो
अलसाई सुबह
और
लम्स तुम्हारी पलकों का
आज
सूरज ने फिर दस्तक दी है
मेरे मन के दरवाजे पर.
तीन
नीम के पत्तों से झरता सूरज
और
हरी घास पे पसरता सूरज
कैक्टस में उलझता सूरज
और
बेंच पे बिछता सूरज
...सब अच्छा लगता है
क्योंकि
यहीं कहीं तुम टहल रहे हो
दांतों में दबाये ब्रश को
और
हथेली में मंजन लिए.