Tuesday, December 15, 2009

कुछ तेरा-कुछ मेरा

खुलते हैं ख्वाब मेरे आँखों में तेरी

बहती हैं धड़कने मेरी सांसों में तेरी

बनती हैं तकदीर मेरी हथेलियों में तेरी

बसती हैं तमन्नाएँ मेरी दुआओं में तेरी.....

5 comments:

  1. kya ab rasyawadi kavitaon ka daur khatm nahi ho gaya...jo likhna hai woh saaf saaf kyon na likha jaye...nahi?

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  2. भारती गौर जी,आप के ब्लाग पर पहली वर आना हुआ .गहन अहसासों के बीच अच्छा लगा .बधाई.

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  3. bahut saandar, Gour sahaab is very lucky. These lines show one soul between you two lives. Great one!

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